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हाथ टूटने के 3 महीने बाद लौटीं 87 साल की शूटर दादी; बोलीं- लड़कियों को धाकड़ भी बनाओ

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नई दिल्ली / हाथ टूटने के 3 महीने बाद लौटीं 87 साल की शूटर दादी; बोलीं- लड़कियों को धाकड़ भी बनाओ

बागपत की रहने वालीं चंद्रो तोमर कमजोरी के कारण घर में ही गिर पड़ी थीं, दाहिने हाथ की हड्डी टूट गई थी
उन्होंने अपने इलाके की कई लड़कियों को बंदूक चलाना सिखाया
नई दिल्ली सरस्वती द्विवेदी संपादक.‘शूटर दादी’ के नाम से मशहूर बागपत (उत्तर प्रदेश)की चंद्रो तोमर अपनी बीमारी से लड़कर फिर एक बार सार्वजनिक जीवन में लौट आई हैं। 87 साल की चंद्रो तोमर ने अपने जोहरी गांव की सैकड़ों लड़कियों को न सिर्फ बंदूक चलाना सिखाया, बल्कि उनकी कोशिशों के चलते ये लड़कियां विश्व स्तर पर अपना जौहर भी दिखाने लगी हैं। दो महीने बीमार रहने के बाद 14 जून को दादी कमजोरी के कारण घर में ही गिर पड़ी थीं, जिसके कारण उन्हें एम्स में भर्ती करना पड़ा था। उनके दाहिने हाथ की हड्डी टूट गई थी।

रविवार को इलाज करवाकर जब वह लौटीं, तो पूरा गांव उनकी हिम्मत को सलाम कर रहा था। उनका जज्बा देखिए कि गांव वालों को अपने पहले ही संबोधन में कहा- ‘लड़की बचाओ, लड़की पढ़ाओ और लड़की खिलाओ भी। लड़कियां देश का नाम कर रही हैं और आगे करेंगी भी। और भाई गरीब के बच्चों की, लड़कियों के लिए काम करो। मैं जब बुढ़ापे में हिम्मत कर रही हूं तो आप भी कीजिए। इनहें धाकड़ बनाओ, अच्छा काम करो। अच्छे काम के घमंड में न रहो।’ दादी चंद्रो अपने आसपास के इलाकों के अलावा दूर के क्षेत्रों के बच्चों को भी ट्रेनिंग देती हैं। उनके तैयार किए गए बच्चों में से कई राष्ट्रीय स्तर पर खेल रहे हैं।

चंद्रो की बेटी सीमा एक अंतरराष्ट्रीय शूटर हैं
चंद्रो की बेटी सीमा एक अंतरराष्ट्रीय शूटर हैं। 2010 में राइफल और पिस्टल विश्व कप में पदक जीतने वाली पहली भारतीय महिला थीं। उनकी पोती नीतू सोलंकी एक अंतरराष्ट्रीय शूटर है, जो हंगरी और जर्मनी की शूटिंग प्रतियोगिताओं का हिस्सा रह चुकी हैं। फिलहाल उनका प्लास्टर कट गया है। शूटर दादी पर फिल्म निर्माता अनुराग कश्यप एक बायोपिक भी बना रहे हैं। इसमें भूमि पेडनेकर और तापसी पन्नू मुख्य भूमिकाओं में हैं।

पहले लोग कहते थे- सठिया गई हैं, अब कहते हैं हमारी शूटर दादी
शूटर दादी चंद्रो पोती के साथ जब शूटिंग स्पर्धा में जाती थीं, तब लोग तंज कसते थे। कहते थे- सठिया गई हैं। बाद में जब राष्ट्रीय स्तर पर ढेरों पुरस्कार मिले तो उनका नजरिया बदल गया। अब जोहरी गांव के बारे में जब भी कोई पूछता है, तो लोग बड़े गर्व के साथ दादी चंद्रो तोमर का नाम लेते हैं। अपने गांव की संस्कृति और पहनावे को उन्होंने खुद से कभी दूर नहीं होने दिया। वह आज भी गांव में रहती हैं।

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