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मध्यप्रदेश : “वेंटिलेटर” की नाब विपरीत दिशा में

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सरस्वती द्विवेदी भोपाल
मध्यप्रदेश विधानसभा चल रही है, सरकार भी जैसे तैसे। कांग्रेस की दरारें पोस्टर की पीछे छिपाने की कोशिशें कम उजागर करने की ज्यादा हो रही है। “विभाजित नेतृत्व” जोर मार रहा है। सारे विधायक और प्रभावशाली नेता पार्टी से पहले अपने क्षत्रप के साथ है और “उसके इक़बाल दिल्ली दरबार में बुलंद है” दिखाने में लगे हैं। यह बुलंदी प्रदर्शन ही आपस में टकराव पैदा करता रहा है और करता रहेगा। प्रदेश में सत्ता में आने के पहले से ही यह टकराव चल रहे थे।

विजय के बाद मुख्यमंत्री चुनने में राहुल गांधी को भी पसीने आ गये थे, क्योंकि नयी पीढ़ी पुराने कांग्रेसियों को खुली चुनौती दे रही थी। बहुत जोर लगाने के बाद कमलनाथ सिर्फ इसलिए मुख्यमंत्री बन सके की पुरानी वफादारी और केंद्र से व्यावसायिक समीकरण उनके पक्ष में थे। अब प्रदेश में नये नेतृत्व की बात केंद्र में युवा नेतृत्व की भांति चल रही है। ये व्यावसायिक समीकरण दिल्ली के इशारे पर प्रदेश के भाजपा नेताओं को धार को चमकाने का मौका नहीं दे रहे हैं। वैसे प्रदेश में भाजपा मंसूबे कर्नाटक और गोवा और से कमजोर नहीं है। मौके की तलाश में सरकार को छोड़ कांग्रेस के सारे गुट और भाजपा है।
अन्य प्रदेशों की तरह मध्यप्रदेश में राहुल गांधी की ताजपोशी के बाद नयी पीढ़ी को ताकत भी मिली थी, किंतु स्वयं राहुल युवा नेतृत्व को राज्यों की कमान देने का साहस नहीं दिखा पाये। उनके अध्यक्ष रहते भी युवा कांग्रेसी नेताओं को दूसरे पायदान से ही संतोष करना पड़ा। और अब राहुल गांधी ने अपने को नये नेता के चयन से पूरी तरह अलग हैं। पूरे देश में कांग्रेस के भीतर नये और पुराने का यह टकराव धीरे-धीरे उबल रहा है। कांग्रेस की कार्यसमिति नये अध्यक्ष के चुनाव की प्रक्रिया कब तय करेगी, अभी यही निश्चित नहीं है। उसके बाद प्रदेश की बारी आयेगी। इससे कांग्रेसियों में बेचैनी बढ़ रही है। कांग्रेस विरोधी ताकतें, विशेष रूप से भाजपा, इस कमजोरी का लाभ उठाने की पूरी कोशिश में है और होना भी चाहिए। लोकसभा चुनाव में कांग्रेस की हार और पुत्रमोह ने कमलनाथ के मुकुट से कुछ पंख नोंच लिए हैं।
कर्नाटक और गोवा की मिसाल सामने है यदि कांग्रेस में नेतृत्व संकट न होता और कमान मजबूत हाथों में होती, तो कांग्रेसी विधायकों को ‘तोड़ना’ इतना आसान नहीं था। भाजपा नेतृत्व लाख इनकार करे, लेकिन कर्नाटक में कांग्रेस-जद (एस) के विधायकों की ‘खरीद-फरोख्त’ करके गठबंधन सरकार को अस्थिर करने का आरोप में दम तो है। लोकसभा में हंगामा पुष्ट प्रमाण तो नहीं पर खीझ का साफ प्रदर्शन है। मध्यप्रदेश सरकार का बजट और उससे पूर्व लगाये गये कर भी ऐसे ही कहानी है।
लोकसभा चुनावों में भाजपा की प्रचंड जीत के साथ ही यह आशंका थी कि शीघ्र ही कर्नाटक, राजस्थान और मध्य प्रदेश सरकारों को अस्थिर करने का राजनीतिक खेल शुरू होगा। इस आशंका के कुछ कारण तब भी थे और अब भी हैं। भाजपा शासन के पहले दौर में अरुणाचल प्रदेश से लेकर उत्तराखंड तक इस तरह के खेल हो चुके हैं। उत्तराखंड में तो हाईकोर्ट के फैसले के बाद कांग्रेस की सरकार बहुमत साबित कर बहाल हो पायी थी। मध्यप्रदेश में अंतर मामूली और समर्थक विधायकों के मांगें बड़ी है तो लालच का आकार भी कमतर नहीं है। सवाल मौके का है। राज्यों में विरोधी दलों की कमजोर सरकारों को अस्थिर करके गिराने का यह खेल नया नहीं है कि ‘लोकतंत्र की हत्या’ के लिए सिर्फ भाजपा को दोषी ठहराया जाये। कांग्रेस ने भी ऐसे खूब खेल खेले हैं। दल-बदल, तोड़फोड़, राज्यपालों और विधान सभाध्यक्षों के ‘विवेकपूर्ण’ फैसलों की आड़ में बहुमत की सरकारें गिरी हैं। क्षीण बहुमत में कभी भी कोई दुर्घटना हो सकती है, अब तक कवच बना व्यावसायिक समीकरण कब तक “वेंटिलेटर” का काम करेगा ? जब कांग्रेस के अपने ही लोग वेंटिलेटर की नाब विपरीत दिशा में घुमा रहे हों।

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