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दिल्ली ने मप्र का पैसा रोका तो कमलनाथ ने जनता पर टैक्स लगा दिया

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सरस्वती द्विवेदी
भोपाल। मध्यप्रदेश के इतिहास में यह पहली बार हुआ है कि केंद्र और राज्य सरकारों ने पेट्रोल/डीजल पर एक साथ टैक्स बढ़ाए हों। यह भी पहली बार हुआ कि सुबह किसी मुख्यमंत्री ने पेट्रोल/डीजल पर मूल्यवृद्धि का विरोध किया हो और शाम को खुद ही मूल्यवृद्धि कर दी हो। चौंकाने वाली बात तो यह है कि कमलनाथ के अघोषित प्रवक्ता मंत्री जीतू पटवारी का कहना है कि यह फैसला भारी मन से लिया है, क्योंकि पीएम नरेंद्र मोदी ने मप्र का 3000 करोड़ रुपए रोक लिया है। प्रश्न यह कि यदि केंद्र सरकार और ज्यादा फंड रोकेगी तो क्या कांग्रेस सरकार भारी मन से किसानों के खेत राजसात कर लेगी।

ना विरोध करेगी ना कांग्रेस
पेट्रोल/डीजल पर बेतुके टैक्स लगाए जाने के बाद मध्यप्रदेश में यह पहली बार हो रहा है कि कोई भी पार्टी इसका विरोध नहीं करेगी क्योंकि केंद्र में भाजपा ने टैक्स थोपा है तो राज्य में कांग्रेस ने भी बिल्कुल वैसा ही किया है। अब से पहले तक यदि केंद्र इस तरह के बेतुके टैक्स बढ़ाए तो विरोधी पार्टी के मुख्यमंत्री साइकिल चलाते थे। यह पूरे देश में शायद पहली बार हुआ है कि जनता पर दोनों पार्टियों ने मिलकर दोहरी मार मारी है।

वचनपत्र में 4 रुपए घटाने का वादा किया था
बता दें कि कांग्रेस ने अपनी चुनावी वचन पत्र में पेट्रोल/डीजल से वैट टैक्स खत्म करने का वादा किया था। कांग्रेस ने ऐलान किया था कि सरकार बनते ही कम से कम 5 रुपए प्रतिलीटर की राहत दी जाएगी। प्राइवेट नौकरियां करने वाले मिडिल क्लास के लिए यह बड़ी राहत की बात थी।

भारी मन से जनता को लूटना कितना उचित
अब तक यदि केंद्र सरकारें, राज्यों का पैसा रोकतीं थीं तो मुख्यमंत्री केंद्र के खिलाफ बयान देते थे। दवाब बनाते थे। शिवराज सिंह तो पीएम मनमोहन सिंह के खिलाफ उपवास पर बैठ गए थे। यह पहली बार हुआ कि किसी राज्य सरकार ने केंद्र पर दवाब बनाने के बजाए जनता पर टैक्स लगाकर अपना खजाना भर लिया।

मंत्री जीतू पटवारी ने दलील दी है कि केंद्र सरकार ने हमारा 3000 करोड़ रुपए रोक लिया है इसलिए भारी मन से मुख्यमंत्री कमलनाथ ने पेट्रोल/डीजल पर टैक्स बढ़ाया। सवाल यह है कि भारी मन से जनता को लूटना कितना उचित है। चुनाव के समय जब मीडिया ने कमलनाथ से सवाल किया था कि घोषणाओं को पूरा करने पैसा कहां से आएगा तब कमलनाथ ने बड़े आत्मविश्वास से जवाब दिया था कि यह उनका काम है। अब यदि वो आत्मविश्वास ही शेष नहीं रह गया तो भारी मन से इस्तीफा दे देना चाहिए।

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