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गृहस्थ संत पं देव प्रभाकर शास्त्री परम पूज्य दद्दा जी का संक्षिप्त जीवन वृत

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रिपोर्टर :- चरणजीत बंजारा
परम् पूज्य दद्दा जी का जन्म अनंत चतुर्दशी के पावन पर्व 19 सितम्बर 1937 को हुआ, अतः प्रति वर्ष तिथि के अनुसार अनंन्त चतुर्दशी को ही जन्म दिवस मनाया जाता रहा है।

तत्कालीन जिला जबलपुर तहसील सिहोरा ( म. प्र) के ग्राम कूंडा (मर्दांनगढ़) के साधारण किसान परिवार में पिता श्री गिरधारी दत्त जी त्रिपाठी एवं पूज्य मां ललिता देवी के यहाँ 19 सितम्बर 1937 अनंत चतुर्दशी को जन्में श्री देव प्रभाकर त्रिपाठी जिन्हें आज लाखों लाख सम्पूर्ण दद्दा शिष्य परिवार, भक्तगण, एवं श्रद्धालु जन बड़ी श्रद्धा से दद्दा जी नाम से संबोधित करते हैं।

दुर्भाग्य वश जब पूज्य दद्दा जी लगभग 8 वर्ष के थे, विक्रम संवाद 2001चैत्र की अमावश्या,1अप्रेल 1946 को पिता पं गिरधारी दत्त जी गौलोक धाम को गमन कर गये, इस संकट की घड़ी में माँ ललिता देवी ने कठोर परिश्रम से कृषि कार्य एवं शिष्य परिवारों में भिक्षाटन कर दद्दा जी को सुशिक्षित करा अपनेँ लक्ष्य को पूर्ण किया।

पूज्य दद्दा जी की प्राथमिक शिक्षा नजदीकी ग्राम खम्हरिया एवं नारायणी संस्कृत विद्यालय कटनी के उपरांत काशी (वाराणसी) के टेड़ीनीम संस्कृत विद्यालय में मध्यम एवं उच्च शिक्षा (गंगा तट लाल घाटी)विरला संस्कृत महाविद्यालय काशी में व्याकरण शास्त्र में शास्त्री की उपाधि प्राप्त करने का गौरव प्राप्त किया।

तभी अध्ययन के समय ही पूज्य दद्दा जी को यतिचक्र चूड़ामणि धर्म सम्राट स्वामी करपात्री जी का सानिध्य प्राप्त हुआ, दद्दा जी पूज्य स्वामी करपात्री जी से दीक्षा ले शिष्य बन गए।करपात्री जी दद्दा जी की विलक्षण प्रतिभा ,सरलता सरलता से बहुत प्रभावित हुए ।स्वामी जी ने दद्दा जी से अपनें अंतर्मन की बात व्यक्त की कि मैनें 11 सबा करोड़ पार्थिव लिंग निर्माण एवं रुद्राभिषेक यज्ञ करनें संकल्प लिया था ,1 यज्ञ गंगा तट पर सम्पन्न भी हुआ, किन्तु अब स्वास्थ्य एवं अन्य कारणों से असंभव सा लगता है। दद्दा जी ने विनम्र आग्रह किया कि यदि आपका आदेश एवं आशिर्वाद प्राप्त हो तो में आपके इस लक्ष्य को पूर्ण करनें का प्रयास करूंगा, पूज्य दद्दा जी के विनम्र भाव से प्रभावित हो पूज्य स्वामी करपात्री जी का दद्दा जी को आदेश प्राप्त हुआ।

काशी से उच्च शिक्षा प्राप्त कर दद्दा जी जिला मिर्जापुर के बरैनी (कछवा)के हनुमंत संस्कृत विद्यालय में प्रधानाचार्य के पद पर नियुक्त हुए थे।

बरैनी में 1 वर्ष आसीन होने के उपरान्त स्वेच्छा से 1962 में वापिस निज ग्राम कूंडा आकर राष्ट्र एवं मानव कल्याणार्थ, देश प्रदेश के अनेक स्थलों में श्रीमदभागवत, शिव् पुराण देवी पुराण कथाऐ, एवं अनेकों यज्ञ अनवरत सम्पन्न कराये गये।

1962 से अभी तक दद्दा जी द्वारा 180 श्री मदभागवत कथाएं, एवं अनगिनत धार्मिक अनुष्ठान सम्पन्न कराये गये।

पूज्य करपात्री जी के आदेश पालन में पूज्य दद्दा जी के द्वारा सवा करोड़ पार्थिव शिव लिंग निर्माण महांयज्ञ नवम्बर 1980 में जबलपुर स्टेडियम से प्रारम्भ कर श्रृंखला को जारी रखते हुई संकल्प का 108 वां यज्ञ बाबा महांकाल की पावन नगरी उज्जयिनी में मोक्ष दायिनी मां सलिला पूण्य माँ क्षिप्रा के पावन तट ऊजरखेड़ा में सिंहस्थ् के पुनीत अवसर पर 3 से 9 मई 2016 तक संपन्न कराया यह क्रम बढ़ते हुई अभी तक 132 सवा करोड़ पार्थिव शिव लिंग निर्माण, महारुद्र यज्ञ एवं रुद्राभिषेक सम्पन्न हो चुके है

साथ ही पूज्य श्री के द्वारा इसके अतिरिक्त सैकड़ों असंख्य पार्थिव शिव् लिंग निर्माण महांरुद्र यज्ञ एवं रुद्राभिषेक यज्ञ एवं धार्मिक अनुष्ठान सम्पन्न कराये गये।

पूज्य श्री के द्वारा अनेको मंदिरों का निर्माण एवं अनेकों जीर्ण मंदिरों का जीर्णोद्धार कराया गया

पूज्य दद्दा जी प्रयासों से अनेकों स्कूल स्वीकृत, शाळा भवनों का निर्माण एवं सुधार कराया गया।

पूज्य दद्दा जी के देश विदेशों में लाखों लाख दीक्षित शिष्य,श्रद्धालु एवं भक्तजन है।जो प्रत्येक यज्ञों में बड़ी संख्या में पहुंच कर यज्ञ में अपनें अपनें निर्धारित कार्यों को पूरी निष्ठा एवं लगन के साथ संपन्न करते है।

दद्दा शिष्य परिवार में देश विदेशों में ख्यातिलब्ध विभिन्न राजनेता, विख्यात फिल्म स्टार, उद्योगपति, पत्रकार, समाजसेवी, अधिकारी, कर्मचारी, कृषक, मजदूर एवं विभिन्न श्रेणी के शिष्य एवं भक्त है किन्तु पूज्य दद्दा जी का स्नेहाशीष सभी को समभाव से ही प्राप्त होता है।एवं सभी को पुत्रवत स्नेह प्राप्त होता है।

पूज्य दद्दा जी के सानिध्य में सभी धार्मिक आयोजन स्थानीय एवं क्षेत्रीय आयोजकों एवं दद्दा शिष्य परिवार भारत वर्ष द्वारा ही सम्पन्न होते है।

किन्हीं भी यज्ञों की कोई भी दक्षिणा एवं अन्य प्राप्त राशि पूज्य दद्दा जी द्वारा स्वयं के लिए स्वीकार नहीं की जाती, पूंर्ण राशि यज्ञ कार्यो एवं जनहित कार्यों में ही व्यय की जाती है।पूज्य दद्दा जी द्वारा मात्र नारियल स्वीकार किए जाते है जिसका उपयोग अनाथ एवं गरीब कंन्याओं की शादी, शिक्षा,एवं स्वास्थ्य में व्यय किया जाता है।

पूज्य दद्दा जी एक सीमांत कृषक रहे कृषि कार्य स्वयं की उपस्थिति एवं देखरेख ही सम्पन्न कराते थे कृषि की आय से ही परिवार का उदर पोषण करते रहे।

पूज्य श्री का रहन सहन पूर्णतः सादगी पूर्ण एवं आडम्बर रहित रहा है।आपका जीवन न केवल हम सभी को प्रभावित करता है,बल्कि सादगी पूंर्ण जीवन जीने की प्रेरणा भी देता है।

पूज्य दद्दा जी का सभी शिष्यों एवं भक्तों को इतना स्नेह एवं आशीर्वाद प्राप्त होता है कि सभी का आत्मीय भाव होता है कि हमारे ही दद्दा जी है।

पूज्य दद्दा जी की अनुपम कृपा ही है कि देश विदेश के लाखों लाख शिष्य परिवारों को भिन्न से अभिन्न बना दिया है, जो सभी एक दुसरे के सुख-दुःख में परिवार की तरह भागीदार होते है।

पूज्य दद्दा जी ने सैकड़ों शिष्यों को साथ लेकर अनेकों धार्मिक यात्राएं चारों धाम, नर्मदा परिक्रमा , नैमिसारण, पशुपतिनाथ (नेपाल) गंगासागर, द्वारकाधीश, अमरनाथ, केदारनाथ,गंगोत्री ,रामेश्वरम,आदि आदि,वाहनों एवं ट्रेनों से अनेकों धार्मिक यात्रायें सम्पन्न कर चुके है।

सभी संत वंदनीय अभिनंदनीय है, किन्तु पूज्य दद्दा जी एक ऐसे महान गृहस्थ संत है जो, सभी जाति एवं धर्मों का सम्मान करते रहे एवं शिष्यों को भी यही प्रेरणा देते रहे।परिणाम स्वरूप इन कार्यक्रमों सभी जाति एवं धर्मों के लोग भाग लेते एवं सहयोग करते देखे जाते है।

प्रत्येक यज्ञों में 18 पुराण, कहीं 108 पुराण या 108 श्रीमद्भागवत पुराण सम्पन्न कराये जाते है।रामलीला दर्शन, रास लीला।आदरणीय अनिल भैया एवं अन्य ख्याति प्राप्त गायकों द्वारा भजन एवं अन्य सांस्कृतिक कार्यक्रम भी सम्पन्न होते है रात्रि 8 बजे से परम् पूज्य दद्दा जी के श्रीमुख से अमृतमयी प्रवचन का लाभ श्रद्धालुजन लेते रहे।

प्रत्येक यज्ञों में प्रति दिन अनवरत भोग प्रसादी (भंडारा) में प्रत्येक आगन्तुक जान प्रसादी प्राप्त करते है।समय समय पर पूज्य दद्दा जी भी स्वयं विप्रजनों के साथ भंडारा में सभी श्रद्धालुओं के साथ प्रसादी प्राप्त करते, समभाव का यह दृश्य चकित करने वाला होता है।

परम पुज्य दद्दा जी के सानिध्य में 132 पार्थिव शिव लिंग निर्माण एवं रुद्राभिषेक यज्ञ सम्पन्न कराये जा चुके है, इससे पूर्व ज्ञात अज्ञात जानकारी में नहीं है, जो इस युग में मात्र पूज्य श्री द्वारा ही संभव हो सका है।

क्रमशः यज्ञ क्रमांक 93 इंदौर । यज्ञ क्र 100 बृन्दावन गार्डन भोपाल।यज्ञ क्र. 104 सागर। यज्ञ क्र,108 उज्जैन में प्रथक पृथक 5 विश्व रिकार्ड स्थापित करने गोल्डन बुक ऑफ वर्ल्ड रिकार्ड में दर्ज किया गया जिसके प्रथक प्रथक 5 प्रमाण पत्र दिये गये।

पूज्य दद्दा जी अपनें कृषि भूमि पर बनें सिद्धाश्रम जिसे घनश्याम बाग के नाम से जाना जाता है, यहीं पर निवास है, जहाँ प्रति दिन सैकड़ों लोगों का आना जाना लगा रहता था एवं लोग पूज्य के दर्शन कर अपनीं समस्यायों से अवगत करानें पर पूज्य श्री द्वारा यथासम्भव निःशुल्क उनका निराकरण किया जाता रहा।

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